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भारतीय संविधान के अनुच्छेदों और अधिकारों को गहराई से समझाती हैं ये 7 फिल्में

गणतंत्र दिवस: 26 जनवरी को देश अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है। यह दिन केवल परेड और तिरंगा फहराने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे संविधान की शक्ति को याद करने का अवसर है। भारतीय सिनेमा ने पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई फिल्में दी हैं जो बोरियत भरे कानूनी पाठ के बजाय मनोरंजन के जरिए आम नागरिक को उसके मौलिक अधिकारों और संविधान के अनुच्छेदों से रूबरू कराती हैं।

आरक्षण से लेकर आर्टिकल 370 तक : सिनेमा में कानून की झलक

भारतीय लोकतंत्र की पेचीदगियों को समझने के लिए कुछ चुनिंदा फिल्में मील का पत्थर साबित हुई हैं। प्रकाश झा की फिल्म ‘आरक्षण’ सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में अनुच्छेद 16 के तहत मिलने वाले समान अवसर और उसके सामाजिक प्रभाव को बारीकी से दिखाती है। वहीं, हंसल मेहता की ‘अलीगढ़’ समलैंगिकता और निजता के अधिकार पर आधारित है, जिसने सेक्शन 377 को खत्म करने की कानूनी लड़ाई की पृष्ठभूमि तैयार की।

हाल के वर्षों में ‘आर्टिकल 370’ जैसी फिल्मों ने कश्मीर के विशेष दर्जे को हटाने की राजनीतिक और कानूनी प्रक्रिया को पर्दे पर उतारा। ये फिल्में दर्शकों को बताती हैं कि संसद में लिए गए फैसले जमीन पर किस तरह का बदलाव लाते हैं।

सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा पर आधारित मस्ट वॉच फिल्में

आर्टिकल 15: आयुष्मान खुराना अभिनीत यह फिल्म जातिगत भेदभाव के खिलाफ संवैधानिक सुरक्षा को कड़े शब्दों में बयां करती है।

जय भीम: यह फिल्म मानवाधिकारों और हाशिए पर खड़े समुदायों के लिए कानूनी संघर्ष की सबसे सटीक तस्वीर पेश करती है।

पिंक: ‘नो मीन्स नो’ के नारे के साथ इस फिल्म ने महिलाओं की सहमति और गरिमा को कानून की नजर से देखने का नजरिया बदला।

मुल्क और ओएमजी: ये फिल्में क्रमशः धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों पर चोट करती हैं।

विशेषज्ञों की राय: क्यों जरूरी है कानूनी साक्षरता 

सिनेमा समाज का आईना है। जब लोग पर्दे पर ‘जय भीम’ या ‘आर्टिकल 15’ जैसी फिल्में देखते हैं, तो वे केवल कहानी नहीं देखते, बल्कि अपने उन अधिकारों को समझते हैं जो उन्हें संविधान ने दिए हैं लेकिन जानकारी के अभाव में वे उनका उपयोग नहीं कर पाते।” — एडवोकेट राजेश कुमार, मानवाधिकार विशेषज्ञ

नागरिकों के लिए संदेश: इस गणतंत्र दिवस क्या करें?

गणतंत्र दिवस की छुट्टी के दौरान इन फिल्मों को देखना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक नागरिक के तौर पर जागरूक होने की प्रक्रिया है। स्थानीय प्रशासन और विधिक सेवा प्राधिकरण अक्सर इस दिन ‘लीगल अवेयरनेस’ कैंप लगाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘पिंक’ जैसी फिल्में देखने के बाद युवा पीढ़ी में कानूनी सहमति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर समझ बढ़ी है। इस 26 जनवरी, परेड के साथ-साथ संविधान की इन कहानियों को भी अपने परिवार के साथ जरूर साझा करें।

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