
रायपुर । छत्तीसगढ़ वन विभाग शीघ्र ही मध्य प्रदेश से बाघों का आयात कर उन्हें गुरु घासीदास–तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व तथा उदंती–सीतानदी टाइगर रिजर्व में छोड़ने की तैयारी में जुटा है। इस उद्देश्य से दोनों टाइगर रिजर्व में बाघों के शिकार प्रजातियों—हिरण आदि—को प्रदेश के विभिन्न चिड़ियाघरों तथा अटारी स्थित नंदनवन जंगल सफारी से लाकर छोड़े जाने की भी योजना बनाई जा रही है। इतना ही नहीं, गुरु घासीदास–तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व में आयातित बाघ को सॉफ्ट रिलीज़ देने के नाम पर लगभग एक हेक्टेयर का बाड़ा (एन्क्लोजर) भी तैयार किया जा रहा है। लेकिन आश्चर्यजनक और दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि वन विभाग अपने ही यहां मौजूद, पूर्णतः स्वस्थ हो चुके एक बाघ को जंगल में छोड़ने के प्रति पूरी तरह उदासीन बना हुआ है और उसे अब भी कैद में रखा गया है।
पूरी घटना इस प्रकार है:
बीजापुर वन मंडल में अप्रैल 2025 में एक बाघ शिकारियों द्वारा लगाए गए लोहे के फंदे में फँसकर गंभीर रूप से घायल हो गया था। वन विभाग की निष्क्रियता के चलते लगभग 20 दिनों तक बाघ फंदे के साथ घूमता रहा, जिससे उसका घाव और गहरा हो गया। बाद में उसे उपचार हेतु नंदनवन जंगल सफारी, रायपुर लाया गया। दिनांक 30 जुलाई 2025 को उस बाघ की एक जटिल लेकिन सफल सर्जरी की गई। सर्जरी के लगभग चार महीने बाद, नवंबर 2025 में की गई विस्तृत चिकित्सकीय जांच में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने बाघ को क्लिनिकली स्वस्थ, सक्रिय और पूरी तरह चलने-फिरने में सक्षम पाया।
चार-चार विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की जांच रिपोर्ट में क्या है:
सर्जरी के चार माह बाद डॉ. पियूष दुबे, डॉ. संतोष आदिल, डॉ. पी. के. चंदन एवं डॉ. जे. के. जाडिया द्वारा की गई जांच में पाया गया कि बाघ पूरी तरह स्वस्थ और सतर्क है। सर्जरी का घाव पूरी तरह भर चुका है और वहां दोबारा बाल उग आए हैं। बाघ घायल पैर पर पूरा वजन डाल पा रहा है तथा पंजे की पकड़ (ग्रिप) सामान्य है। चलने, दौड़ने या जमीन से उठते समय दर्द के कोई लक्षण नहीं दिखे। बाघ दोनों पिछले पैरों पर आराम से पूरे शरीर का वजन संभाल पा रहा है। धीरे चलने पर कभी-कभी बहुत हल्की लंगड़ाहट दिखती है, लेकिन दौड़ते समय कोई लंगड़ाहट नहीं होती। जांच के आधार पर चिकित्सकों ने निष्कर्ष दिया कि बाघ स्वस्थ है और ठीक से भोजन कर रहा है। हल्की लंगड़ाहट सर्जरी में लगाए गए इम्प्लांट या समायोजन के कारण हो सकती है, जो समय के साथ और सुधर सकती है। इस समय इम्प्लांट निकालने की कोई चिकित्सकीय आवश्यकता नहीं है। सर्जरी के चार महीने बाद बाघ की हालत बहुत अच्छी है और उसकी शारीरिक क्षमता संतोषजनक पाई गई है।
भूल गया वन विभाग:
रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने आरोप लगाया कि विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों द्वारा स्पष्ट रूप से यह कहे जाने के बावजूद कि बाघ पूरी तरह स्वस्थ है और सामान्य रूप से चल-दौड़ सकता है, दो माह बीत जाने के बाद भी वन विभाग ने अब तक इस बाघ को उसके उपयुक्त प्राकृतिक आवास में सॉफ्ट रिलीज़ करने की कोई ठोस योजना नहीं बनाई है। न तो कोई समय-सीमा तय की गई है और न ही कोई आधिकारिक पहल दिखाई दे रही है।उन्होंने कहा कि जब विशेषज्ञ डॉक्टर लिखित रूप में स्पष्ट कर चुके हैं कि बाघ पूर्णतः स्वस्थ है, तो एक दिन की भी अनावश्यक देरी उसके प्राकृतिक अधिकारों और वन्यजीव संरक्षण के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
कोर्ट से क्यों छुपाई इस टाइगर की जानकारी:
नितिन सिंघवी ने बताया कि नवंबर 2024 में कोरिया जिले में बाघ के शिकार के बाद माननीय उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज की थी। इसके बावजूद 27.10.2025 और 10.12.2025 को कोर्ट में यह कहा गया कि किसी नई पोचिंग की घटना की जानकारी नहीं है। जबकि अप्रैल 2025 में बीजापुर वन मंडल में बाघ के पोचिंग की यह गंभीर घटना हुई थी और बाद में वही बाघ जंगल सफारी में रखा गया। यह घटना प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) के संज्ञान में पूरी तरह थी। सिंघवी ने सवाल उठाया कि जब यह घटना विभाग के संज्ञान में थी, तो इसे माननीय न्यायालय से क्यों छुपाया गया और क्यों कहा गया कि किसी नई पोचिंग की जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि इस बारे में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) को सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, क्योंकि यह न केवल न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आ सकता है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण जैसे संवेदनशील विषय में पारदर्शिता की कमी को भी उजागर करता है।
सिंघवी ने आरोप लगाया कि वन विभाग का ध्यान मध्य प्रदेश से बाघ लाकर छोड़ने की योजना के प्रचार-प्रसार के माध्यम से सुर्खियाँ बटोरने में लगा है। उन्होंने सवाल किया कि जब बाघ लाने के लिए संसाधन, बाड़े और योजनाएं बनाई जा सकती हैं, तो अपने ही यहां मौजूद स्वस्थ बाघ को जंगल में लौटाने में इतनी बेरुखी क्यों?
उन्होंने कहा कि इस स्वस्थ बाघ को तत्काल उपयुक्त जंगल में सॉफ्ट रिलीज़ किया जाए। वन्यजीव प्रदर्शन की वस्तु नहीं हैं, बल्कि उन्हें प्राकृतिक जीवन का अधिकार दिया जाना चाहिए। अन्यथा यह मामला वन्यजीव संरक्षण नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और नैतिक विफलता का उदाहरण बन जाएगा।




