छत्तीसगढ़

जिस छत्तीसगढ़ी फ़िल्म को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने टैक्स फ्री किया जाने उनकी खासियत

रायपुर। “नंदा जही का ” और “भूलन कांदा” संजीव बक्शी जी की सुप्रसिध्द राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित उपन्यास भूलन कांदा महज एक फ़िल्म नही अपितु सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था पर एक जोर का चाँटा है।

फ़िल्म की शुरुवात एक गाँव से होती है जिसमें एक व्यक्ति भकला और उससे भी महत्वपूर्ण है, उसका एक शब्द “हहो” (हाँ)। सम्पूर्ण गांव का चित्रण आंखों को एक शुकुन देती है। वही जंगल, तालाब, कल-कल बहती नदियाँ और पेड़ो में चहकते चिड़ियां। भोली-भाली जनता और और उन सबका एक सशक्त नेतृत्वकर्ता मुखिया जी, जो निस्वार्थ भाव से गाँव का नेतृत्व और ग्रामीण न्याय व्यवस्था को दुरुस्त करते हुए नजर आते है।

गांव के जंगल मे पाये जाने वाला “भूलन कांदा” जिसके ऊपर पैर रखने पर व्यक्ति अपने गंतव्य स्थल और उद्देश्य को ही तब तक के लिए भूल जाता है, जब तक उसे कोई दूसरा छू न ले। खाप पंचायत में “बीड़ी” और “बकरा भात”की भी विशेष भूमिका है। जहाँ “बीड़ी” लोगो को आपस में जोड़ने और पंचायत प्रारम्भ का उदबोधक भी होता है, वहीं “बकरा भात” दुख और उत्सव दोनों के लिए अनिवार्य होता है।

“भकला” और “बिरजू” जमीन सम्बंधित विवाद के चलते बिरजू का दुर्घटनावश मर जाना और उसके लिए गांव के बुजुर्ग व्यक्ति “गंजहा” द्वारा निःस्वार्थ भाव से इस वारदात की सम्पूर्ण जिम्मेदारी ले लेना और जेल को अपने ससुराल के रूप में मान लेना काफी प्रेरणादायक और आंखों को नम कर देनी वाली घटना होती है। सब कुछ फिर से अच्छा चलने लगा था कि अचानक जेलर द्वारा केस को फिर से ओपन कराना और फिर सच्चाई का पता लगने पर पूरे गांव पर केस दर्ज हो जाना एक नया मोड़ ले आता है । पूरा गांव हँसी-खुशी जेल जाने के लिए ऐसे तैयार हो जाते है, मानो वो किसी पिकनिक में जा रहे हो। गाड़ी-बैला को सजाकर, कही बीच मे ही भोजन बनाने और खाने की पूरी व्यवस्था करना आपको फिर से गांव लौट जाने को प्रेरित करेगा।

अब चक्कर शुरू होता है “भूलन कांदा” अर्थात ” लाल-फीता शाही” मतलब इस जगह जे उस जगह, इस फ़ाइल से उस फाइल, गांव वाले उनको भूलन कांदा से बचाने के लिए छूने लगते है, पर वो तो स्वार्थ और लालच और गलत न्याय व्यवस्था वाली “भूलन के चक्कर” मे थे, थोड़ा समय तो लगेगा ही। लेकिन येन-केन प्रकारेण वो भी भूलन के चक्कर से निकल ही गये और भकला समेत पूरा गांव “निर्दोष” साबित हो ही गया।

ये एक अलग ही भूलन है, जहाँ अपनो के लिए अपने द्वारा बनाया गया कानून पर एक तीखा तमाचा है। कानून ऐसे लोग बना रहे है, जो उनके बारे में केवल पढ़े है और वास्तविकता से परे है तथा ऐसे लोग लागू करने में लगे हुए है, जिनका जमीनी स्तर पर इनका कोई तालुकात नही है और अमल में ला रही है भोली-भाली, मासूस आदिवासी और गांव के निर्दोष छत्तीसगढ़िया जनमानस।

जरूर देखें “भूलन द मेज”
(वास्तविकता और हास्य प्रहसन पर आधारित)

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