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पॉक्सो कानून में ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जोड़ने का सुझाव, किशोरों के आपसी सहमति वाले रिश्तों को राहत देने की तैयारी में सुप्रीम कोर्ट…

नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों को यौन अपराधों से संरक्षण कानून (POCSO Act) के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक अहम और दूरगामी कदम उठाने के संकेत दिए हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि वह पॉक्सो कानून में ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जोड़ने पर गंभीरता से विचार करे, ताकि किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने वास्तविक रिश्तों को कानून की कठोर धाराओं से बचाया जा सके।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने शुक्रवार को अपने फैसले में कहा कि पॉक्सो कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है, लेकिन इसके दुरुपयोग के कई मामले सामने आ रहे हैं। अदालत ने चिंता जताई कि कई बार इस कानून का इस्तेमाल बदले की भावना या निजी विवादों को सुलझाने के लिए किया जाता है, जिससे न्याय की मूल भावना प्रभावित होती है। पीठ ने कहा कि किशोर उम्र में नासमझी या भावनात्मक लगाव के चलते आपसी सहमति से बने रिश्तों को अपराध की श्रेणी में रख देना कई बार अन्यायपूर्ण साबित होता है। ऐसे मामलों में अक्सर परिवारों के विरोध के कारण लड़के के खिलाफ पॉक्सो के तहत केस दर्ज करा दिया जाता है, जबकि दोनों पक्षों के बीच सहमति होती है। चूंकि पॉक्सो कानून में सहमति का कोई प्रावधान नहीं है और पीड़ित की उम्र 18 साल से कम होने पर आरोपी को कड़ी सजा का सामना करना पड़ता है, इसलिए अदालत ने कानून में संतुलन बनाने की जरूरत बताई है।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस फैसले की एक प्रति भारत सरकार के कानून सचिव को भेजी जाए, ताकि इस संभावित खतरे को रोकने और आवश्यक सुधारों पर विचार किया जा सके। अदालत का मानना है कि ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जैसे प्रावधान से यह पहचान करना आसान होगा कि कौन से मामले वास्तव में गंभीर अपराध हैं और कौन से महज किशोरावस्था के आपसी संबंध। यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर आया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले में आरोपी को जमानत देते समय निर्देश दिया था कि पॉक्सो के हर मामले में पुलिस को शुरुआत में ही पीड़ित का मेडिकल परीक्षण कराना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्देश को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत के चरण में हाई कोर्ट अनिवार्य जांच प्रोटोकॉल तय नहीं कर सकता और न ही इस स्तर पर मिनी ट्रायल जैसा आचरण कर सकता है।

अदालत ने यह भी साफ किया कि पीड़ित की उम्र का निर्धारण ट्रायल यानी मुकदमे की सुनवाई का विषय है, न कि जमानत देने का। फैसले में कहा गया कि यदि उम्र को लेकर विवाद हो, तो जमानत देने वाली अदालत केवल उपलब्ध दस्तावेजों को देख सकती है, लेकिन उनकी सत्यता पर अंतिम निर्णय नहीं दे सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि मेडिकल साक्ष्य न्याय की प्रक्रिया में एक निष्पक्ष गवाह की भूमिका निभाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पॉक्सो कानून में संभावित सुधार की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है, जिससे एक ओर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके और दूसरी ओर कानून के दुरुपयोग पर भी प्रभावी रोक लगाई जा सके।

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