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26 साल बाद फिर पहनी CRPF की वर्दी, कभी बने थे संत; गिरवर सिंह की संघर्ष भरी कहानी

मुरैना। मध्य प्रदेश के मुरैना निवासी गिरवर सिंह तोमर की जिंदगी की कहानी संघर्ष, आस्था और दृढ़ संकल्प की मिसाल है। कभी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी CRPF में हवलदार के रूप में देश की सेवा करने वाले गिरवर सिंह को विभागीय कार्रवाई के बाद वर्ष 1999 में नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने मंदिर में रहकर संत का जीवन अपना लिया, लेकिन CRPF की वर्दी में दोबारा लौटने का सपना नहीं छोड़ा।

1991 में शुरू की थी सीआरपीएफ की नौकरी

छिछावली गांव के रहने वाले गिरवर सिंह तोमर ने वर्ष 1991 में CRPF में हवलदार के पद पर सेवा शुरू की थी। करीब आठ साल तक नौकरी करने के बाद एक वरिष्ठ अधिकारी से विवाद हुआ। इसके बाद उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई और वर्ष 1999 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

नौकरी जाने के बाद गिरवर सिंह मुरैना लौट आए और उन्होंने आध्यात्मिक जीवन की राह पकड़ ली। उन्होंने मंदिर में रहकर पूजा-पाठ और साधना शुरू की। बाद में वे गुफा मंदिर पहुंचे, जहां गिरवर दास महाराज के नाम से संत के रूप में पहचान बनाने लगे। हालांकि, उन्होंने अपनी नौकरी वापस पाने की कानूनी लड़ाई जारी रखी।

26 साल तक चला नौकरी वापस पाने का संघर्ष

गिरवर सिंह ने 1999 में ही हाईकोर्ट का रुख किया था। करीब आठ साल बाद वर्ष 2007 में उनके पक्ष में फैसला आया, लेकिन CRPF की ओर से इस फैसले पर रोक ले ली गई। इसके बाद मामला फिर लंबी कानूनी प्रक्रिया में चला गया।

गिरवर सिंह ने हार नहीं मानी और हाईकोर्ट की डबल बेंच में अपील की। वर्षों तक चली सुनवाई के बाद अगस्त 2025 में हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए सेवा बहाल करने का आदेश दिया।

अगस्त 2026 में दोबारा पहनी वर्दी

अदालत के आदेश के बावजूद तत्काल नियुक्ति नहीं मिलने पर गिरवर सिंह ने अधिकारियों को कानूनी नोटिस भेजा और सेवा में वापस लेने की मांग जारी रखी। आखिरकार अगस्त 2026 में उनका इंतजार खत्म हुआ। CRPF में उनकी दोबारा नियुक्ति हुई और उन्हें छत्तीसगढ़ के बीजापुर में तैनाती मिली।

आदेश मिलने के बाद गिरवर सिंह बीजापुर पहुंचे और ड्यूटी ज्वाइन की। करीब 26 साल बाद उन्होंने एक बार फिर CRPF की वर्दी पहनी। इस दौरान उन्होंने लगभग दो दशक मंदिर सेवा और साधना में बिताए।

गिरवर सिंह की कहानी बताती है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, लंबे संघर्ष और उम्मीद के सहारे मंजिल हासिल की जा सकती है। नौकरी गंवाने के बाद संत का जीवन अपनाने के बावजूद उन्होंने अपने अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखी और आखिरकार वर्षों बाद दोबारा उसी वर्दी में लौटे, जिसे उन्होंने कभी देशसेवा के लिए पहना था।

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