छत्तीसगढ़दुर्ग

11 महीने तलाश, पोस्टर चिपकाए, फिर बजी फोन की घंटी.. नौकरी छोड़ मां को लेने भागी बेटी

भिलाई। छत्तीसगढ़ के भिलाई से एक बेहद भावुक और दिल को छू लेने वाली कहानी सामने आई है, जहां 11 महीने से लापता अपनी मां की तलाश में भटक रही बेटी ने आखिरकार उन्हें ढूंढ निकाला। करीब 322 दिनों तक लगातार तलाश, पोस्टर, लोगों से पूछताछ और उम्मीद के सहारे चल रही इस बेटी की मेहनत आखिर रंग लाई। भिलाई के फील परमार्थम आश्रम में जब मां और बेटी आमने-सामने हुईं, तो वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं।

जानकारी के अनुसार बुजुर्ग महिला मूल रूप से बिहार के भागलपुर क्षेत्र की रहने वाली हैं। करीब 11 महीने पहले वह अचानक लापता हो गई थीं। परिवार ने उनकी हर जगह तलाश की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। मां के गायब होने के बाद बेटी पूरी तरह टूट गई थी। बताया जा रहा है कि उसके पिता का पहले ही अपहरण हो चुका था, ऐसे में मां ही उसकी पूरी दुनिया थीं।

मां की तलाश में बेटी ने अपनी नौकरी तक ठुकरा दी। उसने गांव-शहरों में पोस्टर लगाए, रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक स्थानों पर लोगों से पूछताछ की और लगातार मां को ढूंढने की कोशिश करती रही। इस दौरान उसने कई राज्यों में जाकर जानकारी जुटाई, लेकिन हर बार निराशा हाथ लगी। बावजूद इसके उसने उम्मीद नहीं छोड़ी।

इसी बीच भिलाई स्थित फील परमार्थम आश्रम में रह रही एक बुजुर्ग महिला ने बातचीत के दौरान “बांका” शब्द बोला। आश्रम के लोगों को यह शब्द कुछ अलग लगा, जिसके बाद उन्होंने महिला के बारे में और जानकारी जुटाने की कोशिश की। धीरे-धीरे यह जानकारी बिहार तक पहुंची और फिर महिला की बेटी से संपर्क स्थापित हुआ। जब बेटी को पता चला कि उसकी मां भिलाई के एक आश्रम में हैं, तो उसने बिना देर किए वहां पहुंचने का फैसला किया।

बताया जा रहा है कि बेटी बिना रिजर्वेशन ट्रेन के जनरल डिब्बे में बैठकर भागलपुर से भिलाई पहुंची। लंबा सफर तय करने के बाद जब वह आश्रम पहुंची और अपनी मां को देखा, तो खुद को रोक नहीं पाई। मां-बेटी एक-दूसरे से लिपटकर फूट-फूट कर रो पड़ीं। यह भावुक दृश्य देखकर आश्रम के कर्मचारी और वहां मौजूद लोग भी भावुक हो गए।

आश्रम प्रबंधन ने बताया कि बुजुर्ग महिला की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी और उनकी याददाश्त भी काफी कमजोर हो चुकी थी। इसी कारण वह अपने घर या परिवार के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं दे पा रही थीं। लेकिन एक शब्द “बांका” ने पूरे मामले को जोड़ दिया और आखिरकार परिवार तक पहुंचने का रास्ता बन गया।इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि परिवार का रिश्ता कितना गहरा होता है और सच्ची कोशिश कभी बेकार नहीं जाती। बेटी की मां के प्रति समर्पण और संघर्ष की यह कहानी अब लोगों के लिए प्रेरणा बन गई है।

महिला 3 जून को घर से लापता हुई थी। बताया जा रहा है कि महिला 65 वर्षीय बबीता देवी अपने मायके जगतपुर जाने के लिए घर से निकली थीं। उन्होंने अपनी बेटी से 10 दिन में लौटने का वादा किया था, लेकिन वह कभी वापस नहीं पहुँचीं। पूजा के जीवन में दुखों का सिलसिला बहुत पुराना है। उसके जन्म से पहले ही पिता का अपहरण हो गया था और तब से माँ-बेटी ही एक-दूसरे की पूरी दुनिया थे। माँ के अचानक गायब हो जाने से पूजा की दुनिया ठहर गई थी। उसने भागलपुर से लेकर पूर्णिया और कटिहार तक के दर्जनों वृद्धाश्रमों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों की खाक छानी। दीवारों पर पोस्टर चिपकाए और पुलिस से गुहार लगाई, लेकिन माँ का कहीं पता नहीं चला। अब पूजा अपनी मां से मिल चुकी है खुश है और कहती है कि संस्था का धन्यवाद भविष्य में वह कुछ बनेंगे तो इस संस्था के लिए जरूर कुछ करेंगी…

तलाश का यह कठिन सफर तब खत्म हुआ जब भिलाई के फील परमार्थम आश्रम की टीम को बबीता देवी विक्षिप्त अवस्था में मिलीं। आश्रम के संस्थापक अमित राज ने उन्हें आश्रय दिया। लंबे समय तक अपनी सुध-बुध खोए रखने के बाद, 10 मई को अचानक बबीता देवी जिन्हें वें प्यार से फूंकी बुलाते थे उनकी यादों में ‘जगतपुर बांका’ नाम उभरा। इसी एक शब्द ने उम्मीद की किरण जगाई और आश्रम की टीम ने बांका पुलिस के जरिए पूजा से संपर्क साधा। जब पूजा को माँ के भिलाई में होने की खबर मिली, तब वह एक कोचिंग में काम कर रही थी। छुट्टी न मिलने पर उसने बिना संकोच अपनी नौकरी छोड़ दी और तुरंत जनरल बोगी में सवार होकर भिलाई पहुँच गई। पूजा का यह संघर्ष न केवल एक बेटी के साहस की मिसाल है, बल्कि फील परमार्थम जैसे संस्थानों की सेवा भावना का भी प्रमाण है, जो अब तक 50 से अधिक बिछड़े हुए लोगों को उनके परिवारों से मिला चुके हैं।

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