क्या बीच में बंद कर सकते हैं अपनी LIC पॉलिसी? कितना होगा नुकसान

LIC : जीवन बीमा यानी लाइफ इंश्योरेंस हम सभी अपने और अपने परिवार के सुरक्षित भविष्य के लिए खरीदते हैं. लेकिन जीवन में कई बार ऐसे आर्थिक हालात पैदा हो जाते हैं, जब प्रीमियम का बोझ उठाना भारी पड़ने लगता है. ऐसे में पॉलिसी को बीच में ही बंद करने या सरेंडर करने का ख्याल आना बहुत स्वाभाविक है. अगर आप भी अपनी एलआईसी पॉलिसी को मैच्योरिटी से पहले बंद करने का मन बना रहे हैं, तो रुकिए. पॉलिसी सरेंडर करने से न सिर्फ आपकी सुरक्षा खत्म होती है, बल्कि आपकी जमा पूंजी का एक बड़ा हिस्सा भी नुकसान में जा सकता है. इस पूरी प्रक्रिया और इसके नफा-नुकसान को समझना बेहद जरूरी है।
क्या होता है पॉलिसी सरेंडर
इंश्योरेंस की दुनिया में जब आप पॉलिसी को उसकी तय अवधि पूरी होने से पहले ही बंद कर देते हैं और बीमा कंपनी से अपना पैसा वापस मांगते हैं, तो इस प्रक्रिया को ‘पॉलिसी सरेंडर’ कहा जाता है. आम तौर पर लोगों को लगता है कि उन्होंने जितना पैसा प्रीमियम के तौर पर भरा है, वह उन्हें वापस मिल जाएगा. लेकिन हकीकत इससे अलग होती है. कंपनी आपको जो रकम वापस करती है, उसे ‘सरेंडर वैल्यू’ कहते हैं. यह रकम आपके द्वारा जमा किए गए कुल प्रीमियम से काफी कम हो सकती है. पॉलिसी के दस्तावेजों में सरेंडर चार्ज और अन्य कटौतियों का जिक्र होता है, जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं. नतीजा यह होता है कि बुरे वक्त में मदद के लिए जमा किया गया पैसा उम्मीद से कम वापस मिलता है।
सिर्फ पैसे ही नहीं, सुरक्षा कवच का भी होता है अंत
पॉलिसी सरेंडर करने का सबसे बड़ा और गंभीर नुकसान आर्थिक नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से होता है. जैसे ही आप पॉलिसी सरेंडर करते हैं, आपका जीवन बीमा कवरेज तत्काल प्रभाव से खत्म हो जाता है. इसका सीधा मतलब यह है कि अगर भविष्य में पॉलिसीधारक के साथ कोई अनहोनी हो जाती है, तो उसके परिवार या नॉमिनी को कोई भी डेथ बेनिफिट (मृत्यु दावा राशि) नहीं मिलेगा. जिस उद्देश्य से आपने सालों पहले यह पॉलिसी ली थी, वह उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है. टर्म इंश्योरेंस के मामले में तो स्थिति और भी अलग होती है. टर्म प्लान में कोई सेविंग कंपोनेंट नहीं होता, इसलिए इसे बीच में छोड़ने पर न तो कवरेज बचता है और न ही कोई पैसा वापस मिलता है।
क्यों काटा जाता है आपकी जमा पूंजी का बड़ा हिस्सा?
अक्सर पॉलिसीधारक यह सवाल पूछते हैं कि उनका पूरा पैसा वापस क्यों नहीं मिलता? इसके पीछे बीमा का गणित काम करता है. पॉलिसी के शुरुआती वर्षों में आप जो प्रीमियम भरते हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा एजेंट के कमीशन, पॉलिसी जारी करने के प्रशासनिक खर्च और अंडरराइटिंग चार्जेज में चला जाता है. यही कारण है कि अगर कोई व्यक्ति पॉलिसी शुरू होने के शुरुआती 2 से 4 सालों के भीतर उसे बंद करता है, तो उसे भारी नुकसान उठाना पड़ता है. एंडोमेंट या मनी-बैक पॉलिसी में मिलने वाले बोनस और लॉयल्टी एडिशन जैसे फायदे भी पॉलिसी सरेंडर करते ही शून्य हो जाते हैं. यानी लंबे समय तक निवेश बनाए रखने का जो लाभ आपको मिल सकता था, वह एक झटके में खत्म हो जाता है।
पॉलिसी बंद करने के बजाय क्या है बेहतर विकल्प?
अगर आप आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं और प्रीमियम भरना मुश्किल है, तो पॉलिसी बंद करना ही एकमात्र रास्ता नहीं है. आप अपनी पॉलिसी को ‘पेड-अप’ (Paid-Up) करवा सकते हैं. यह एक तरह का बीच का रास्ता है. इसमें आप आगे का प्रीमियम देना बंद कर देते हैं, लेकिन पॉलिसी बंद नहीं होती. वह कम बीमा राशि के साथ मैच्योरिटी तक चलती रहती है. हालांकि इसमें मिलने वाले फायदे कम हो जाते हैं, लेकिन आपका कवरेज पूरी तरह खत्म नहीं होता. इसके अलावा, बीमा नियामक IRDAI ने हाल ही में नियमों में कुछ बदलाव किए हैं, जिससे कुछ विशेष परिस्थितियों में पॉलिसीधारकों को पहले की तुलना में थोड़ी बेहतर सरेंडर वैल्यू मिल सकती है. इसलिए अंतिम फैसला लेने से पहले अपनी बीमा कंपनी से ‘सरेंडर वैल्यू’ और ‘पेड-अप वैल्यू’ दोनों का हिसाब जरूर मांग लें।



