खैरागढ़। महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए शुरू की गई महतारी वंदन योजना में बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। खैरागढ़ जिले के ग्राम मुढ़ीपार निवासी तिलोक साहू नामक एक पुरुष का आवेदन योजना में स्वीकृत हो गया और उसके खाते में लगातार 12 महीने तक योजना की राशि पहुंचती रही। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि आवेदन में उसने खुद को ही अपना पति बताया था, फिर भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सुपरवाइजर दोनों ने आवेदन को सत्यापित कर दिया।
खुद ही हितग्राही, खुद ही पति
ऑनलाइन रिकॉर्ड के अनुसार आवेदन में हितग्राही का नाम तिलोक साहू और पति का नाम भी तिलोक साहू दर्ज था। इसके बावजूद आवेदन को खैरागढ़ परियोजना के मुढ़ीपार सेक्टर की आंगनबाड़ी और सुपरवाइजर स्तर पर सत्यापित कर दिया गया। इसके बाद संबंधित बैंक खाते में हर महीने महतारी वंदन योजना की राशि जमा होती रही।
एक साल बाद खुली विभागीय लापरवाही
यह मामला करीब एक साल बाद सामने आया। रिकॉर्ड में अब आवेदन की स्थिति ‘परमानेंट होल्ड’ और ‘लाभ त्याग अनुरोध स्वीकृत’ दिखाई दे रही है। लेकिन सवाल यह है कि यदि मामला सामने नहीं आता, तो क्या भुगतान आगे भी जारी रहता?
12 महीने भुगतान, लेकिन रिकवरी सिर्फ 10 महीने की?
मामले में एक और बड़ा विरोधाभास सामने आया है। ऑनलाइन भुगतान रिकॉर्ड के मुताबिक संबंधित व्यक्ति को 12 महीने तक योजना की राशि मिली, जबकि 3 जुलाई 2026 को एकीकृत बाल विकास सेवा परियोजना, खैरागढ़ ने बैंक को जारी पत्र में केवल 10 हजार रुपये शासन के खाते में वापस जमा कराने के निर्देश दिए।ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि यदि 12 किस्तों का भुगतान हुआ, तो वसूली सिर्फ 10 महीने की राशि की ही क्यों की गई? बाकी राशि का क्या हुआ, इसका जवाब विभागीय जांच के बाद ही सामने आएगा।
जिला परियोजना अधिकारी ने क्या कहा?
जिला परियोजना अधिकारी पी.आर. खुटेल ने बताया कि संबंधित हितग्राही से राशि की रिकवरी कर ली गई है। हालांकि अन्य तथ्यों के संबंध में उन्होंने रिकॉर्ड देखने के बाद जानकारी देने की बात कही।
सत्यापन व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
यह मामला महतारी वंदन योजना की सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। महिलाओं के लिए बनाई गई योजना में एक पुरुष का आवेदन कैसे दर्ज हुआ? आवेदन में हितग्राही और पति का नाम एक ही होने के बावजूद आंगनबाड़ी और सुपरवाइजर ने उसे सत्यापित कैसे कर दिया? आखिर एक साल तक किसी अधिकारी की नजर इस गड़बड़ी पर क्यों नहीं पड़ी?अब सवाल सिर्फ राशि की रिकवरी का नहीं, बल्कि उन अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने का भी है, जिनकी लापरवाही से यह पूरा मामला संभव हुआ।



