छत्तीसगढ़बिलासपुर

67 इंजीनियरों की नियुक्ति रद्द : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला,14 साल की नौकरी के बाद सेवाकाल को किया गया अवैध

बिलासपुर । छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा वर्ष 2011 में आयोजित सब-इंजीनियर (सिविल) भर्ती प्रक्रिया को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने इस भर्ती प्रक्रिया में पाई गई गंभीर अनियमितताओं को आधार बनाते हुए 67 सब-इंजीनियरों की नियुक्तियों को अवैध घोषित कर उन्हें रद्द करने का आदेश दिया है। हाई कोर्ट का यह फैसला सरकारी भर्तियों में नियमों के पालन और पारदर्शिता को लेकर एक अहम नजीर के तौर पर देखा जा रहा है।

यह महत्वपूर्ण निर्णय मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने अपने फैसले में साफ शब्दों में कहा कि जिन अभ्यर्थियों के पास आवेदन की अंतिम तिथि तक निर्धारित शैक्षणिक योग्यता नहीं थी, उनकी नियुक्ति कानूनन मान्य नहीं हो सकती। ऐसे मामलों में नियुक्ति को शुरू से ही शून्य माना जाएगा।

हाई कोर्ट ने कहा कि किसी भी भर्ती प्रक्रिया में विज्ञापन में तय की गई पात्रता शर्तों और नियमों का कड़ाई से पालन किया जाना अनिवार्य है। इन शर्तों में किसी भी तरह की छूट या लापरवाही न केवल कानून के खिलाफ है, बल्कि इससे योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों का भी हनन होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बाद में योग्यता प्राप्त कर लेने के आधार पर किसी अभ्यर्थी को पात्र नहीं माना जा सकता, यदि वह आवेदन की अंतिम तिथि तक आवश्यक योग्यता पूरी नहीं करता था।

मामले की सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि वर्ष 2011 की इस भर्ती प्रक्रिया में कई ऐसे उम्मीदवारों को नियुक्त कर दिया गया, जो निर्धारित समयसीमा तक जरूरी शैक्षणिक मापदंडों को पूरा नहीं करते थे। इसके बावजूद उन्हें चयनित कर सेवा में शामिल कर लिया गया, जो भर्ती नियमों का खुला उल्लंघन है। कोर्ट ने इसे न केवल नियमों के खिलाफ बताया, बल्कि इसे प्रशासनिक मनमानी की श्रेणी में भी रखा।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि ऐसी अवैध नियुक्तियों को बनाए रखना न्यायसंगत नहीं होगा, क्योंकि इससे उन योग्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय होता है, जिन्होंने सभी नियमों और शर्तों को पूरा करने के बावजूद चयन से वंचित रह गए। अदालत ने माना कि एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया को नजरअंदाज कर की गई नियुक्तियां कानूनी कसौटी पर टिक नहीं सकतीं।

इस फैसले के बाद पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की 2011 की भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। साथ ही, यह निर्णय भविष्य की सरकारी भर्तियों के लिए एक स्पष्ट संदेश भी देता है कि नियमों से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला राज्य में सरकारी नियुक्तियों को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है।हाई कोर्ट का यह आदेश न केवल संबंधित 67 नियुक्तियों पर असर डालेगा, बल्कि इससे अन्य विभागों की पुरानी और विवादित भर्तियों की भी समीक्षा की मांग उठ सकती है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button