छत्तीसगढ़

जंगल में फिर तेंदुए की मौत : वन विभाग की लापरवाही से हिल गया पूरा सिस्टम — हाईकोर्ट की सख्ती के बावजूद नहीं थम रही रहस्यमयी मौतें

डोंगरगढ़/खैरागढ़, छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़-खैरागढ़ वन क्षेत्र में एक बार फिर तेंदुए की मौत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ताजा मामला डोंगरगढ़ वन परिक्षेत्र के रानीगंज इलाके का है, जहां शुक्रवार को एक तेंदुआ मृत अवस्था में पाया गया। 

यह कोई पहली घटना नहीं है। इसी बेल्ट में पिछले कुछ महीनों से लगातार तेंदुओं और अन्य वन्यजीवों की संदिग्ध मौतें सामने आ रही हैं, लेकिन इसके बावजूद वन विभाग की ओर से न तो प्रभावी निगरानी दिख रही है और न ही कोई ठोस सुरक्षा रणनीति।

पोस्टमार्टम के बाद जल्दबाजी में दाह संस्कार

वन विभाग के मुताबिक मृत तेंदुए का डॉक्टरों की टीम से पोस्टमार्टम कराया गया और फिर उसका दाह संस्कार कर दिया गया। विभाग का दावा है कि तेंदुए की मौत आंतरिक चोट (इंटरनल इंज्यूरी) के कारण प्राकृतिक रूप से हुई।

डीएफओ आयुष जैन ने भी इसे प्राकृतिक मृत्यु बताया है, लेकिन जिस तरह से पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक किए बिना जल्दबाजी में दाह संस्कार किया गया, उसने पूरे मामले को संदेह के घेरे में डाल दिया है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर मौतें प्राकृतिक हैं, तो फिर एक ही क्षेत्र में बार-बार तेंदुओं की जान क्यों जा रही है?

हाईकोर्ट पहले ही ले चुका है संज्ञान

इस पूरे मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहले ही तेंदुओं और अन्य वन्यजीवों की संदिग्ध मौतों पर संज्ञान ले चुका है। पूर्व मामलों में कोर्ट ने अवैध शिकार, कमजोर गश्त और वन्यजीव सुरक्षा में लापरवाही को लेकर वन विभाग से जवाब भी मांगा था और पारदर्शी जांच के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद हालात में कोई ठोस सुधार नजर नहीं आ रहा।

जमीनी हकीकत: कमजोर गश्त, लचर निगरानी

स्थानीय लोगों और वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि इस पूरे बेल्ट में गश्त बेहद कमजोर है।

न तो आधुनिक निगरानी तंत्र प्रभावी है और न ही अवैध गतिविधियों पर समय रहते कार्रवाई होती है।

हर नई मौत के बाद विभाग सिर्फ “प्राकृतिक मौत” का बयान जारी कर देता है, लेकिन न तो विस्तृत पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक होती है और न ही स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाती है।

वन्यजीव संरक्षण पर बड़ा सवाल

रानीगंज में तेंदुए की यह ताजा मौत एक बार फिर यह दिखाती है कि छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण का तंत्र कितनी गंभीर संकट में है।

अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि

क्या यह मामला भी फाइलों में “प्राकृतिक मौत” बनकर दबा दिया जाएगा,

या फिर हाईकोर्ट की सख्ती के बाद कोई ठोस, पारदर्शी और जवाबदेह कार्रवाई सामने आएगी।

वन्यजीवों की सुरक्षा सिर्फ कागजों में नहीं, जमीन पर दिखनी चाहिए — और यही इस पूरे मामले का असली सवाल है। 🐆

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