चैत्र का महीना हुआ शुरू, अगले एक महीने न खाएं ये चीजें, जानिए आपके भले की कुछ जरूरी बातें…

धार्मिक : 4 मार्च को होली से चैत्र मास शुरू हो गया हैं। चैत्र मास हिन्दुओं का नववर्ष होता है। इस महीने में चैत्र नवरात्रि से लेकर कई व्रत त्योहार मनाए जाते हैं, साथ ही इस महीने से गर्मी भी दस्तक देने लगती है।
धर्म के साथ-साथ मौसम में बदलाव भी दिखने लगते हैं। इसलिए चैत्र मास को लेकर धर्म-शास्त्रों में विशेष नियम बताए गए हैं, जिनका पूरे महीने जरूर पालन करना चाहिए, वरना कई बड़े मुश्किलें का सामना करना पड़ सकता है, जैसे- धन हानि, बीमारियां घेरना, दुर्भाग्य और समस्याएं आना आदि।
चैत्र महीने में क्या करने से बचना चाहिए?
मांसाहार का सेवन न करें
ज्योतिष एवं वास्तु-शास्त्र के अनुसार, चैत्र महीने में मांसाहार का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि इस पूरे महीने में मांसाहार का सेवन करने से मां लक्ष्मी रुष्ट हो सकती हैं और इससे घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ सकती है। इसलिए ऐसी गलती करने से बचना चाहिए।
गुड़ का सेवन
कहा जाता है कि, पूरे चैत्र महीने में आपको गुड़ के सेवन से बचना चाहिए। गुड़ की तासीर गर्म होती है और गर्मी बढ़ने के कारण इसका सेवन सेहत को भी नुकसान पहुंचा सकता है और ऐसा करने से माता लक्ष्मी भी नाराज हो जाती हैं।
नकारात्मक या बुरे विचारों से बचें
चैत्र मास बेहद पवित्र महीना होता है। हिंदू नववर्ष की शुरुआत होती है। इस महीने में अपनी सोच सकारात्मक रखें और धर्मोचित आचरण करें। नकारात्मक या बुरे विचारों और गलत आचरण से बचें, वरना मां दुर्गा का कोप सहना पड़ सकता है।
चमड़े से बने वस्तुओं का इस्तेमाल न करें
चैत्र के पूरे महीने में चमड़े से बनी चीजों का इस्तेमाल भी नहीं करना चाहिए। चूंकि चमड़ा बनाने के लिए जानवरों की चमड़ी का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए चमड़े का इस्तेमाल इस पावन महीने में वर्जित माना जाता है।
नाखून-बाल ना काटें
चैत्र नवरात्रि का समय बेहद पवित्र समय होता है। इन 9 दिनों में नाखून और बाल न काटें। न ही दाढ़ी बनाएं।
चैत्र माह का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार चैत्र मास सृष्टि की रचना का प्रतीक है। कई ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि इसी माह से ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना आरंभ की थी। इसलिए इसे नव आरंभ और नई ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
यह महीना ऋतु परिवर्तन का भी संकेत देता है। इस समय शीत ऋतु विदा लेती है और ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है। मौसम में बदलाव के कारण शरीर और मन को संतुलित रखने की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि इस माह में व्रत, उपवास, ध्यान और सात्विक आहार पर विशेष जोर दिया जाता है।
धार्मिक दृष्टि से यह महीना साधना, संकल्प और आत्मशुद्धि का काल माना जाता है। मान्यता है कि इस समय किए गए जप-तप और दान-पुण्य का विशेष फल प्राप्त होता है।



