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अब इस दिन सूरज पर लगेगा ग्रहण जानें भारत में क्या होगा असर

नई दिल्ली : ‘साल 2026 खगोलीय घटनाओं के लिहाज से बेहद खास माना जा रहा है। फरवरी में साल का पहला सूर्य ग्रहण लगने के बाद अब लोगों की नजरें साल के दूसरे और अंतिम सूर्य ग्रहण पर टिकी हैं। यह सूर्य ग्रहण 12 अगस्त 2026 को लगेगा, जिसे खगोल विज्ञान में पूर्ण सूर्य ग्रहण (खग्रास सूर्य ग्रहण) कहा जाता है। इस दौरान चंद्रमा कुछ समय के लिए सूर्य को पूरी तरह ढक लेता है, जिससे दिन में भी अंधेरा जैसा माहौल बन सकता है। हालांकि कई लोगों के मन में सवाल है कि क्या यह ग्रहण भारत में दिखाई देगा और इसका समय क्या रहेगा।

खगोल वैज्ञानिकों और पंचांग के अनुसार साल का दूसरा सूर्य ग्रहण 12 अगस्त 2026 को सावन मास की अमावस्या तिथि पर लगेगा। यह ग्रहण वैज्ञानिक और ज्योतिषीय दोनों दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दुनिया के कई हिस्सों में लोग इस दुर्लभ खगोलीय घटना को देखने के लिए उत्साहित हैं।

ग्रहण का सटीक समय (भारतीय समय अनुसार)

ज्योतिषीय गणनाओं के मुताबिक इस सूर्य ग्रहण की टाइमिंग इस प्रकार बताई जा रही है:

ग्रहण की शुरुआत: रात 9 बजकर 04 मिनट

ग्रहण का मध्य (परम ग्रास): रात 11 बजकर 14 मिनट

ग्रहण की समाप्ति: रात 1 बजकर 27 मिनट (13 अगस्त की भोर)

पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान कुछ समय के लिए सूर्य पूरी तरह से चंद्रमा के पीछे छिप जाता है। इस समय आकाश में अंधेरा छा सकता है और तापमान में भी हल्की गिरावट महसूस की जा सकती है।

क्या भारत में दिखाई देगा यह सूर्य ग्रहण?

भारत के लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या यह सूर्य ग्रहण यहां दिखाई देगा। वैज्ञानिकों के अनुसार यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। इसकी वजह यह है कि जब ग्रहण लगेगा तब भारत में रात का समय होगा। इसलिए भारत के लोग इस खगोलीय घटना को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख पाएंगे।

चूंकि ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूतक काल भी मान्य नहीं होगा और धार्मिक गतिविधियों पर किसी प्रकार की रोक नहीं रहेगी।

इन देशों में दिखाई देगा सूर्य ग्रहण

यह पूर्ण सूर्य ग्रहण मुख्य रूप से उत्तरी गोलार्ध के कई देशों में दिखाई देगा। खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार यह ग्रहण आर्कटिक क्षेत्र, ग्रीनलैंड और आइसलैंड में साफ दिखाई देगा। इसके अलावा उत्तरी स्पेन, पुर्तगाल, यूरोप के कई देशों, कनाडा, रूस के उत्तर-पूर्वी हिस्सों और उत्तर-पश्चिम अफ्रीका में भी लोग इस दुर्लभ खगोलीय नजारे को देख सकेंगे।

इन क्षेत्रों में कुछ समय के लिए दिन में अंधेरा छा सकता है, जिसे देखने के लिए खगोल प्रेमी विशेष उपकरणों का उपयोग करते हैं।

सूर्य ग्रहण क्यों लगता है?

वैज्ञानिक दृष्टि से सूर्य ग्रहण तब लगता है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है। इस स्थिति में चंद्रमा सूर्य की रोशनी को कुछ समय के लिए पृथ्वी तक पहुंचने से रोक देता है। जब चंद्रमा सूर्य को पूरी तरह ढक लेता है तो उसे पूर्ण सूर्य ग्रहण कहा जाता है।

पौराणिक कथा क्या कहती है?

हिंदू धर्मग्रंथों में सूर्य ग्रहण को लेकर एक रोचक कथा भी प्रचलित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के समय जब अमृत निकला, तब देवताओं और असुरों के बीच उसे पाने को लेकर विवाद हो गया। उसी समय स्वरभानु नाम का एक राक्षस देवताओं का रूप धारण करके उनकी पंक्ति में बैठ गया और अमृत की कुछ बूंदें पी लीं।

जब सूर्य और चंद्रमा ने उसकी पहचान भगवान विष्णु को बताई तो विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन अमृत पी लेने के कारण वह मर नहीं सका। उसका सिर राहु और धड़ केतु कहलाया। पौराणिक मान्यता के अनुसार राहु और केतु समय-समय पर सूर्य और चंद्रमा को ग्रस लेते हैं, जिसे ग्रहण कहा जाता है।

इस तरह सूर्य ग्रहण वैज्ञानिक दृष्टि से एक खगोलीय घटना है, वहीं धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं में भी इसका विशेष महत्व माना गया है।

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