
गौरतलब है कि मानसून में चार महीनों तक रेत घाट का संचालन वैधानिक रूप से प्रतिबंधित रहता है। बावजूद इसकेे प्रदेश के कई इलाकों में प्रतिबंध के बावजूद रेत घाट से रेत का अवैध खनन की शिकायते आम बात है। आपको बता दे प्रदेश के बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, कोरबा, रायगढ़ और बलरामपुर जैसे जिलों में नदियों का सीना छलनी कर खुलेआम अवैध खनन किये जाने की बात सामने आ रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई घाटों में तय सीमा से कई गुना ज्यादा रेत निकाली जा रही है और उसका अवैध भंडारण किया जा रहा है।
ताकि बारिश के मौसम में ऊंचे दामों पर बेचा जा सके।जानकारों की मानें तो हर साल बारिश के दौरान घाट बंद होने के बाद रेत की कीमतें दो से तीन गुना तक बढ़ जाती हैं। यही वजह है कि माफिया अभी से बड़े पैमाने पर रेत जमा करने में लगे हुए हैं। कई जगहों पर नदी से कुछ ही दूरी पर रेत के पहाड़ खड़े कर दिए गए हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग की नजरें इन पर नहीं पड़ रही हैं।
राजनीतिक संरक्षण के आरोप
रेत के अवैध कारोबार को लेकर सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक संरक्षण पर उठ रहा है। सूत्रों का दावा है कि कई जिलों में सत्ता से जुड़े लोगों के संरक्षण के कारण माफियाओं के हौसले बुलंद हैं। यही वजह है कि बड़े स्तर पर अवैध खनन के बावजूद कार्रवाई केवल छोटे वाहनों तक सीमित रह जाती है। खनिज विभाग समय-समय पर 5 से 7 गाड़ियों को पकड़कर कार्रवाई का दावा जरूर करता है। लेकिन जिन घाटों से रोजाना सैकड़ों हाईवा रेत निकल रही है? वहां बड़े माफियाओं पर शिकंजा कसने की हिम्मत विभाग नहीं जुटा पा रहा। विभागीय अधिकारी भी ऑफ रिकॉर्ड राजनीतिक दबाव की बात स्वीकार कर रहे हैं।
भंडारण की जांच से खुल सकती है पोल
रेत भंडारण के लिए खनिज विभाग से अनुमति लेना अनिवार्य होता है। लेकिन आरोप है कि कई जिलों में अनुमति की आड़ में तय क्षमता से 10 गुना तक ज्यादा रेत का भंडारण किया जा रहा है। यदि प्रशासन निष्पक्ष तरीके से भंडारण स्थलों की जांच करे, तो करोड़ों रुपये के अवैध कारोबार का खुलासा हो सकता है। आपको बता दे जांजगीर, कोरबा, बिलासपुर, रायगढ समेत अधिकांश जिलों में तय क्षमता से कई गुना ज्यादा रेत का अवैध भंडारण अभी से किया जा रहा है। वहीं औद्योगिक जिलों में भंडारण की कोई सीमा ही नहीं है। बावजूद इसके खनिज विभाग की नजरें ऐसे अवैध भंडारण पर कभी भी नहीं पड़ती। या यह कह ले कि जवाबदार अधिकारी इस अवैध भंडारण की तरफ देखना ही नहीं चाहतेे।
पर्यावरण पर बड़ा खतरा
अवैध खनन का सबसे बड़ा असर नदियों और पर्यावरण पर पड़ रहा है। लगातार मशीनों से खुदाई होने के कारण नदी की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हो रही है। कई जगहों पर जलस्तर नीचे जाने और कटाव बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इस पर सख्ती नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। हाईकोर्ट की फटकार के बाद प्रशासन हरकत में आता है, लेकिन समय बीतने के साथ ही प्रशासन और खनिज विभाग अपने उसी पुराने ढर्रे में आ जाते है। जिसका फायदा उठाकर खनन माफिया नदियों का सीना छलनी कर रेत के अवैध कारोबार को अंजाम दे रहे है।
सवालों के घेरे में सिस्टम
सरकार बदलने के बाद अवैध कारोबार पर सख्ती के बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। खुलेआम चल रहे अवैध खनन के बावजूद प्रशासनिक कार्रवाई सीमित नजर आ रही है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि आखिर सिस्टम की आंखों के सामने नदियों की लूट कब तक जारी रहेगी ? क्या जिम्मेदार अधिकारी कभी बड़े माफियाओं पर कार्रवाई करेंगे या फिर हर बार की तरह खानापूर्ति कर मामले को दबा दिया जाएगा ? अब देखने वाली बात होगी कि प्रदेश में चल रहे इस अवैध रेत कारोबार पर सरकार और प्रशासन कोई बड़ा कदम उठाते हैं या फिर मानसून के चार महीनों में रेत माफियाओं की चांदी और नदियों की बर्बादी का खेल यूं ही चलता रहेगा।




