
रायपुर । डाक विभाग में भरोसे के नाम पर हुए एक बड़े वित्तीय घोटाले को लेकर राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने बेहद सख्त और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। आयोग ने स्पष्ट रूप से माना है कि डाक विभाग के एजेंटों और विभागीय कर्मचारियों की आपसी मिलीभगत के कारण उपभोक्ता को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इसी के चलते आयोग ने भारतीय डाक विभाग को निर्देश दिया है कि वह पीड़ित उपभोक्ता को 1 करोड़ 91 लाख 39 हजार रुपये से अधिक की राशि 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित वापस करे।
मामला वर्ष 2016 से 2020 के बीच का है, जब रायपुर निवासी रिटायर्ड ए ग्रेड डॉक्टर अनिल कुमार पांडेय और उनकी पत्नी ने डाकघर की विभिन्न बचत योजनाओं के तहत कुल 19 फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) कराई थीं। ये एफडी डाक विभाग के अधिकृत एजेंट के माध्यम से कराई गई थीं, जिससे दंपती को किसी भी तरह के संदेह की गुंजाइश नहीं लगी। डाक विभाग की विश्वसनीय छवि के चलते उन्होंने बड़ी रकम निवेश की।
हालांकि वर्ष 2021 में उस समय हड़कंप मच गया, जब लगभग 10 करोड़ रुपये के बड़े घोटाले का खुलासा हुआ। जांच में सामने आया कि इस घोटाले में अनिल कुमार पांडेय की 18 एफडी की मैच्योरिटी राशि भी शामिल थी, जो उन्हें वापस नहीं मिल पाई। यही नहीं, यह घोटाला सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें प्रोफेसर, वकील, सरकारी अधिकारी और अन्य प्रतिष्ठित लोग समेत 50 से अधिक निवेशकों के साथ धोखाधड़ी की गई थी।
घोटाले का मास्टरमाइंड, जिसने डाक विभाग के एजेंटों और कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत से इस पूरे फर्जीवाड़े को अंजाम दिया, बाद में खुदकुशी कर चुका है। लेकिन उसके इस कदम से पीड़ितों का नुकसान खत्म नहीं हुआ। लंबे समय तक न्याय के लिए भटकने के बाद डॉक्टर पांडेय ने राज्य उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
राज्य उपभोक्ता आयोग ने सुनवाई के दौरान डाक विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। आयोग ने कहा कि यदि विभागीय स्तर पर समय रहते निगरानी और नियंत्रण होता, तो उपभोक्ताओं के साथ इतना बड़ा धोखा नहीं होता। आयोग ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि उपभोक्ता की राशि की सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह डाक विभाग की है, चाहे लेनदेन एजेंट के माध्यम से ही क्यों न हुआ हो।
आयोग ने भारतीय डाक विभाग को कड़ी फटकार लगाते हुए आदेश जारी किया कि वह तय समयसीमा के भीतर पूरी राशि ब्याज सहित लौटाए। इस फैसले को न केवल पीड़ित पक्ष के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, बल्कि यह भविष्य में सरकारी संस्थानों की जवाबदेही तय करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।



