नई दिल्ली। यौन अपराध के मामलों में पीड़ितों की गरिमा और सम्मान को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अहम पहल की है। अब पुलिस थानों में FIR दर्ज करने से लेकर अदालत में सुनवाई और फैसला लिखने तक ऐसी भाषा के इस्तेमाल से बचना होगा, जो पीड़ित के प्रति पूर्वाग्रह पैदा करती हो। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद हाई कोर्ट ने राज्य की निचली अदालतों, पुलिस और संबंधित विभागों को संवेदनशील एवं लैंगिक न्याय आधारित शब्दावली अपनाने के निर्देश दिए हैं।
इस व्यवस्था का उद्देश्य एफआईआर दर्ज होने से लेकर जांच, न्यायिक कार्यवाही और अंतिम फैसले तक पीड़ित की गरिमा, निजता और सम्मान बनाए रखना है। किसी पीड़ित के चरित्र, निजी जीवन या सामाजिक स्थिति को लेकर पूर्वाग्रहपूर्ण टिप्पणी से भी बचने को कहा गया है।
24 जिला एवं सत्र न्यायालयों को भेजा आदेश
हाई कोर्ट ने अपने निर्देशों की प्रति प्रदेश के सभी 24 जिला एवं सत्र न्यायालयों, स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी, राज्य एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, मुख्य सचिव, गृह विभाग, डीजीपी तथा महिला एवं बाल विकास विभाग को भेजी है। संबंधित संस्थाओं को आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
‘प्रॉसिक्यूट्रीक्स’ की जगह सर्वाइवर या विक्टिम
नई शब्दावली में यौन अपराध की महिला पीड़ित के लिए ऐसे शब्दों से बचने पर जोर दिया गया है, जो उसकी स्थिति को अपमानजनक या रूढ़िवादी तरीके से पेश करते हों। ‘प्रॉसिक्यूट्रीक्स’ की जगह मामले के संदर्भ के अनुसार सर्वाइवर, विक्टिम या शिकायतकर्ता जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाएंगे।
इसी तरह ‘लाचार महिला’ या ‘बेबस औरत’ जैसे संबोधनों के बजाय महिला या सर्वाइवर जैसे सम्मानजनक शब्दों को प्राथमिकता दी जाएगी। ‘अस्मत’ और ‘शील भंग’ जैसी पुरानी अभिव्यक्तियों के स्थान पर शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन या यौन हमला जैसे कानूनी और तटस्थ शब्द इस्तेमाल किए जाएंगे।
‘चरित्रहीन’ जैसे शब्दों से भी बचना होगा
निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि यौन अपराध से जुड़े मामलों में महिला के चरित्र, कपड़ों, निजी संबंधों या व्यक्तिगत जीवन को आधार बनाकर कोई पूर्वाग्रहपूर्ण भाषा नहीं अपनाई जानी चाहिए।
‘चरित्रहीन’ जैसे विशेषणों के बजाय मामले का आकलन उपलब्ध साक्ष्य और कानून के आधार पर किया जाएगा। इसी तरह ‘रखैल’ या ‘कीप’ के स्थान पर पार्टनर अथवा महिला मित्र जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाएंगे। ‘वेश्या’ या ‘कॉलगर्ल’ के बजाय संदर्भ के अनुरूप ‘सेक्स वर्कर’ शब्द को प्राथमिकता दी जाएगी।
पुलिस थाने से अदालत तक बदलेगा व्यवहार
नई व्यवस्था का प्रभाव केवल न्यायिक आदेशों और फैसलों तक सीमित नहीं होगा। पुलिस थानों में एफआईआर लिखने और जांच की प्रक्रिया के दौरान भी पीड़ितों के प्रति सम्मानजनक और गैर-भेदभावपूर्ण भाषा का इस्तेमाल करना होगा।
संवेदनशील मामलों में पीड़ित की पहचान और निजता की रक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, ताकि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उसे अनावश्यक सामाजिक या मानसिक परेशानी का सामना न करना पड़े।
गवाहों के सम्मान पर भी जोर
हाई कोर्ट के निर्देशों में गवाहों के साथ सम्मानजनक व्यवहार को भी महत्वपूर्ण माना गया है। गवाहों का परिचय उनकी सामाजिक स्थिति या किसी पूर्वाग्रहपूर्ण पहचान के आधार पर कराने के बजाय तथ्यात्मक और सम्मानजनक तरीके से करने पर जोर है।
संवेदनशील मामलों में आवश्यकता के अनुसार बंद कमरे में सुनवाई यानी इन-कैमरा ट्रायल की व्यवस्था का पालन किया जाएगा। इसका उद्देश्य पीड़ित और गवाहों को अतिरिक्त सामाजिक दबाव से बचाना है।
सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद राज्य में लागू व्यवस्था
यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट से जुड़े मामले में स्वतः संज्ञान लेने और सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय समिति की सिफारिशों के बाद सामने आया है।
इस पहल का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में ऐसी भाषा और व्यवहार को खत्म करना है, जिससे पीड़ित के प्रति पूर्वाग्रह पैदा हो या अपराध की गंभीरता कमतर दिखाई दे। अब न्यायिक भाषा में घटना के विवरण के साथ-साथ पीड़ित की गरिमा की रक्षा को भी अहम माना जाएगा।
अब किस तरह की भाषा होगी प्राथमिकता
पुरानी/असंवेदनशील भाषा प्राथमिकता वाली भाषा
प्रॉसिक्यूट्रीक्स सर्वाइवर / विक्टिम / शिकायतकर्ता
लाचार महिला / बेबस औरत महिला / सर्वाइवर
अस्मत / शील भंग शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन / यौन हमला
हवस यौन हिंसा
चरित्रहीन साक्ष्य और कानून आधारित विवरण
कीप / रखैल पार्टनर / महिला मित्र
वेश्या / कॉलगर्ल सेक्स वर्कर
किन्नर / हिजड़ा संदर्भानुसार सम्मानजनक लैंगिक पहचान
अनपढ़ / देहाती गवाह विवेकशील / समझदार या तथ्यात्मक परिचय




