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बस्तर दशहरा: ‘मुरिया दरबार’ के राजनीतिकरण पर CM विष्णु देव साय का कांग्रेस पर पलटवार, बोले— ‘जनजाति समाज को सिर्फ वोट बैंक समझा’

रायपुर। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक कार्यक्रम ‘मुरिया दरबार’ के राजनीतिकरण के आरोपों पर कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ जगदलपुर रवाना होने से पहले रायपुर एयरपोर्ट पर मीडिया से बातचीत में मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस ने हमेशा जनजाति समाज को सिर्फ ‘वोट बैंक’ की तरह इस्तेमाल किया है, लेकिन अब यह समाज कांग्रेस का साथ छोड़ चुका है।

मुख्यमंत्री साय ने कांग्रेस से कड़ा सवाल पूछते हुए कहा, “कांग्रेस के लोग बताएं कि उन्होंने इतने दशकों तक देश में राज किया, तब जनजाति समाज के लिए क्या किया? हमारी सरकार इस समाज का लगातार चौतरफा विकास कर रही है।”


📌 छत्तीसगढ़ के लिए ऐतिहासिक दिन, पहली बार शामिल होंगी राष्ट्रपति

मुख्यमंत्री ने बस्तर दौरे को लेकर कहा कि आज का दिन छत्तीसगढ़ के इतिहास में दर्ज होने जा रहा है। विश्व प्रसिद्ध और दुनिया के सबसे लंबे (75 दिनों तक) चलने वाले बस्तर दशहरा में पहली बार देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शामिल होने जा रही हैं। वे मुरिया दरबार में पहुंचकर पारंपरिक प्रतिनिधियों, मांझी और चालकी से मुलाकात करेंगी और उनके गांवों की समस्याएं सुनेंगी। गौरतलब है कि पिछले साल इस कार्यक्रम में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी शिरकत की थी।


⚠️ क्या है ‘मुरिया दरबार’ नाम का पूरा विवाद?

बस्तर दशहरा की करीब 700 साल पुरानी इस परंपरा को लेकर विवाद तब शुरू हुआ, जब जिला प्रशासन द्वारा जारी प्रशासनिक पाम्पलेट (कार्यक्रम सूची) में ‘मुरिया दरबार’ की जगह ‘आम दरबार’ छाप दिया गया था। नाम बदले जाने को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं आईं और जमकर सवाल उठने लगे। मामला गरमाता देख प्रशासन को तुरंत बैकफुट पर आना पड़ा और सोमवार को नया पाम्पलेट जारी कर दोबारा ‘मुरिया दरबार’ नाम दर्ज किया गया।


👑 700 साल पुरानी ऐतिहासिक परंपरा और इसका महत्व

‘मुरिया दरबार’ बस्तर की राजशाही और पारंपरिक व्यवस्था का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है:

  • राजशाही का दौर: राजा इस दरबार में बैठते थे, जहां विभिन्न गांवों के पारंपरिक मुखिया (मांझी-चालकी) अपने क्षेत्रों की समस्याएं राजा के सामने रखते थे और राजा उनका मौके पर ही समाधान करते थे।
  • लोकतांत्रिक दौर: राजशाही समाप्त होने के बाद भी इस परंपरा को जीवित रखा गया है। अब सूबे के मुख्यमंत्री या देश के बड़े जनप्रतिनिधि इस दरबार में शामिल होकर बस्तर के आदिवासियों और ग्रामीणों की समस्याएं सुनते हैं।

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