माँ दुर्गा, इस बार जब आप आएँ, तो केवल हमारे घरों में मत आना, हमारे भीतर भी आना।
हम आपका स्वागत दीप-फूल-आरती से करते हैं, पर पूजा के बाद फिर उसी क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार में लौट जाते हैं जिसने हमारे संबंधों की कोमलता छीन ली है। एक ही छत के नीचे रहकर भी हम एक-दूसरे की आँखों की नमी नहीं पढ़ पाते।
अजय तिवारी जी लिखते हैं – दुर्गा का आह्वान केवल बाहर की बुराई के विनाश की प्रतीक्षा नहीं, अपने भीतर उन प्रवृत्तियों को पहचानने का साहस है जो प्रेम को अधिकार में और शक्ति को हिंसा में बदल देती हैं।
यदि माँ मन में उतरें तो विचारों की भीड़ में मौन जागे, यदि बुद्धि में उतरें तो सत्य स्वीकारने का साहस आए, यदि प्राण में उतरें तो इच्छाशक्ति अधिकार नहीं, अपने भीतर की अव्यवस्था संभालना सीखे।
इस नवरात्रि जब दीप जले, तो हमारे भीतर भी कुछ ऐसा जले जो किसी दूसरे को न जलाए, बल्कि हमारे अज्ञान को प्रकाशित करे।
लेख – अजय तिवारी
*रवि कुमार तिवारी आवाम दूत – विशेष रिपोर्ट | खरोरा/तिल्दा



