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बिलासपुर में गरबा के नाम पर फूहड़ता पर छिड़ा विवाद: माता रानी की आराधना में ‘लॉलीपॉप लागेलु’ गाने पर डांस, महंगे पास बेचने पर उठे गंभीर सवाल

बिलासपुर। बिलासपुर में नवरात्रि का पावन पर्व माता रानी की आराधना, श्रद्धा और शक्ति की उपासना का प्रतीक है। लेकिन इसी आस्था के बीच, शहर में हुए कुछ गरबा आयोजनों के स्वरूप को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। भक्ति और आस्था के इस पर्व में व्यावसायिकता और सांस्कृतिक मर्यादा के उल्लंघन को लेकर स्थानीय लोगों और संस्कृति प्रेमियों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है।

सांस्कृतिक मर्यादा तार-तार, भक्ति के मंच पर भोजपुरी गानों का शोर
विवाद का मुख्य केंद्र शहर में आयोजित हुआ ‘पंखिड़ा डांडिया’ कार्यक्रम बना हुआ है। मां दुर्गा की आराधना के लिए सजे इस मंच पर पारंपरिक देवी गीतों और गरबा धुनों की जगह भोजपुरी के प्रसिद्ध कमर्शियल गाने ‘लॉलीपॉप लागेलु’ पर जमकर डांस किया गया। हैरान करने वाली बात यह रही कि इस आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध भोजपुरी अभिनेता और सांसद रवि किशन भी शामिल हुए थे। भक्ति के नाम पर आयोजित इस मंच पर इस तरह के गानों और फूहड़ता को लेकर अब तीखी आलोचना हो रही है। लोगों का कहना है कि जहां एक ओर मां की उपासना में सिर झुकाया जाता है, वहीं दूसरी ओर ऐसे द्विअर्थी और फिल्मी गानों पर थिरकना पूरी तरह से अवांछनीय है।

आस्था के नाम पर भारी व्यावसायिकता: महंगे पास बेचने का आरोप
इस आयोजन को लेकर केवल गानों पर ही नहीं, बल्कि इसकी भारी व्यावसायिकता पर भी उंगलियां उठ रही हैं। आरोप है कि माता की भक्ति के नाम पर इस कार्यक्रम के बेहद महंगे पास बेचे गए। आम जनता और श्रद्धालुओं का कहना है कि गरबा और डांडिया मां की शक्ति पूजा का एक पारंपरिक और सांस्कृतिक माध्यम है, लेकिन इसे एक विशुद्ध कमर्शियल इवेंट में तब्दील कर दिया गया है। चंद पैसों के मुनाफे और मनोरंजन के लिए त्योहार की मूल भावना और गरिमा को ताक पर रख दिया गया।

जनता उठा रही सवाल: कहाँ खो गई भक्ति?
इस पूरे घटनाक्रम के बाद बिलासपुर के प्रबुद्ध नागरिकों और सनातन समाज में इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि आखिर मां दुर्गा की आराधना के नाम पर होने वाले इन आधुनिक आयोजनों में भक्ति और सांस्कृतिक मर्यादा का कितना ध्यान रखा जा रहा है? क्या आयोजन समितियां सिर्फ ग्लैमर और कमाई के चक्कर में हमारी सनातन संस्कृति का मखौल उड़ा रही हैं?

स्थानीय लोगों की मांग है कि भविष्य में ऐसे आयोजनों को अनुमति देने से पहले प्रशासन और आयोजन समितियों को कड़े दिशा-निर्देश तय करने चाहिए, ताकि आस्था के महापर्व पर व्यावसायिकता और फूहड़ता का ग्रहण न लग सके।

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