नई दिल्ली/रायपुर: देश में डिजिटल लेनदेन के सबसे लोकप्रिय माध्यम UPI पर नए चार्ज लगाने के केंद्र सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. वकील अंजन दत्ता ने एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर केंद्र सरकार द्वारा 14 सितंबर को जारी गजट नोटिफिकेशन और 15 सितंबर को जारी MDR (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) फ्रेमवर्क को रद्द करने की मांग की है.
याचिकाकर्ता का तर्क है कि बिना किसी पर्याप्त कानूनी आधार, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के यह मनमाना फैसला लिया गया है, जिसका अंतिम बोझ घूम-फिरकर देश के आम नागरिकों पर ही पड़ेगा.
क्या है नया नियम और कब से होगा लागू?
सरकार के नए नियम के मुताबिक, आगामी 15 अक्टूबर से बड़े मर्चेंट (व्यापारी) ट्रांजैक्शन पर 0.4% MDR शुल्क लागू होने जा रहा है. इसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा व्यावसायिक भुगतानों पर ही यह शुल्क देय होगा.
- ₹75,000 या उससे अधिक के बड़े लेन-देन के लिए अधिकतम चार्ज (कैपिंग) ₹300 प्रति ट्रांजैक्शन तय की गई है.
- ₹2,000 तक के छोटे मर्चेंट पेमेंट्स पूरी तरह से मुफ्त रहेंगे.
आम जनता और P2P ट्रांसफर पर क्या असर होगा?
इस विवाद के बीच केंद्र सरकार और वित्त मंत्रालय ने साफ किया है कि आम उपभोक्ताओं को इस फैसले से घबराने की जरूरत नहीं है. सरकार के अनुसार:
- P2P (पर्सन-टू-पर्सन) ट्रांसफर पूरी तरह फ्री: एक आम यूजर द्वारा दूसरे यूजर को भेजे जाने वाले पैसे पर किसी भी राशि का कोई चार्ज नहीं लगेगा.
- 96% मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर असर नहीं: देश में होने वाले लगभग 96 फीसदी व्यापारिक भुगतान ₹2,000 से कम के होते हैं, इसलिए छोटे दुकानदारों और ग्राहकों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा.
चुनौती का मुख्य आधार
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता ने इस शुल्क व्यवस्था को तय करने के तरीकों, दरों और सेक्टोरल क्लासिफिकेशन पर सवाल उठाए हैं. याचिका में यह भी कहा गया है कि पूर्ण मर्चेंट डिस्काउंट रेट नियमों को आधिकारिक तौर पर ठीक से प्रकाशित नहीं किया गया है और यह व्यवस्था छोटे मार्जिन पर काम करने वाले व्यापारियों को नुकसान पहुंचा सकती है.
अब देखना होगा कि इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख रहता है और क्या 15 अक्टूबर से यह नियम देशभर में लागू हो पाएगा.



