गणेशोत्सव के अंतिम दिन यानी अनंत चतुर्दशी पर भगवान श्री गणेश की मूर्तियों का विसर्जन अत्यधिक श्रद्धा और उत्साह के साथ किया जाता है। हालांकि, कई बार यह तिथि ‘पंचक’ नक्षत्रों के दौरान आ जाती है। ऐसे में श्रद्धालुओं के मन में यह असमंजस और भय उत्पन्न हो जाता है कि “क्या पंचक में गणेश विसर्जन करना अशुभ है?”
आइए, ज्योतिष शास्त्र, धर्मशास्त्रों और परंपराओं के आलोक में पंचक तथा गणेश विसर्जन से जुड़ी भ्रांतियों का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विश्लेषण करें।
१. पंचक क्या है? (ज्योतिषीय दृष्टिकोण)
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशि में संचार करता है, तब उस समय अवधि को ‘पंचक’ कहा जाता है। इस दौरान चंद्रमा पाँच नक्षत्रों—धनिष्ठा (उत्तरार्ध), शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती से होकर गुजरता है।
पंचक के दौरान कुछ विशिष्ट लौकिक एवं सांसारिक कार्यों (जैसे घर की छत ढालना, लकड़ी या ईंधन इकट्ठा करना, दक्षिण दिशा की यात्रा करना, नया निर्माण कार्य शुरू करना आदि) को वर्जित माना गया है।
२. प्रचलित भ्रांतियां और उनका खंडन
पंचक को लेकर समाज में कई तरह की लोक-धारणाएं प्रचलित हैं, जो शास्त्रसम्मत नहीं हैं:
भ्रांति १: “पंचक काल पूरी तरह से अशुभ होता है और इसमें कोई धार्मिक कार्य नहीं हो सकता।”
सत्य: पंचक पूरी तरह अशुभ नहीं होता। रक्षाबंधन, दीपावली, नवरात्र या गणेशोत्सव जैसे पूर्व-निर्धारित पर्वों और धार्मिक आयोजनों में पंचक का कोई दोष नहीं लगता।
भ्रांति २: “पंचक में विसर्जन करने से घर में हानि या अमंगल होता है।”
सत्य: देव प्रतिमाओं का विसर्जन कोई ‘नया लौकिक कार्य’ नहीं है, बल्कि यह एक धार्मिक अनुष्ठान का विधिवत समापन है। भगवान गणेश ‘विघ्नहर्ता’ हैं; उनकी उपासना या विसर्जन पर किसी नक्षत्र का अशुभ प्रभाव लागू नहीं होता।
भ्रांति ३: “पंचक में विसर्जन रोकने के लिए कोई विशेष उपाय या शांति पूजा करनी चाहिए।”
सत्य: जहाँ दोष ही नहीं है, वहाँ किसी उपाय की आवश्यकता भी नहीं है। पंचक का नियम केवल शव-दाह या कुछ सांसारिक कार्यों के संदर्भ में है। देव-प्रतिमा विसर्जन में किसी भी प्रकार के ‘दोष-निवारण’ या ‘उपाय’ की कोई आवश्यकता शास्त्रों में नहीं बताई गई है।
३. शास्त्र क्या कहते हैं? (धार्मिक सिद्धांत)
धर्मशास्त्रों और ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार:
तिथि की प्रधानता: अनंत चतुर्दशी स्वयं में एक अत्यंत सिद्ध और पवित्र तिथि है। जब कोई धार्मिक पर्व तिथि-आधारित होता है, तो उसमें नक्षत्रों के सामान्य दोष स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
संकल्प की पूर्ति: गणेश जी की स्थापना एक निश्चित समय (१, ३, ५, ७ या १० दिन) के संकल्प के साथ की जाती है। संकल्पित पूजा का विसर्जन निर्धारित समय पर ही होना चाहिए। विसर्जन को पंचक के डर से टालना धार्मिक दृष्टि से अनुचित है।
गणपति सर्वविघ्नविनाशक हैं: भगवान श्री गणेश स्वयं सभी प्रकार के ग्रह-नक्षत्रों के स्वामी और विघ्नहर्ता हैं। जिनकी पूजा से सभी ग्रह दोष दूर होते हैं, उनके विसर्जन में किसी मुहूर्त या पंचक का भय रखना भक्ति-सिद्धांत के विपरीत है।
४. विसर्जन का सही शास्त्रसम्मत भाव
गणेश विसर्जन के समय किसी भी तरह के भय, शंका या ‘उपाय’ के विचार से मुक्त रहकर केवल निम्नलिखित भाव रखना चाहिए:
उत्सव और कृतज्ञता: विसर्जन को किसी आशंका के साथ नहीं, बल्कि पूरे आनंद, ढोल-नगाड़ों और कृतज्ञता के भाव से करें।
क्षमा प्रार्थना: विसर्जन के समय भगवान से केवल अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा माँगें और “अगले बरस तू जल्दी आ” के साथ उनसे पुनः पधारने का निवेदन करें।
निष्कर्ष
पंचक में गणेश विसर्जन को लेकर फैला संशय केवल अज्ञानता और लोक-भ्रांतियों का परिणाम है। शास्त्र स्पष्ट रूप से यह अनुमति देते हैं कि अनंत चतुर्दशी या अपनी निर्धारित तिथि पर गणेश विसर्जन बिना किसी झिझक के किया जाना चाहिए। विघ्नहर्ता की विदाई में भय नहीं, केवल भक्ति और उल्लास होना चाहिए।
भागवताचार्य पं गिरीश पाण्डेय
(एस्ट्रोसेज पैनल मेंबर)
शिवाय एस्ट्रोलॉजी पाइंट
अमरैया पारा पिथौरा
महासमुंद छत्तीसगढ़
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